मेनाक धिया, लोकक कियै?
हिमवान! कहू ई होयत कोना!
धरती पर उतरत गंग कोना!
गिरिराजक कोर जे जनल-पोसल,
नभ अंतहीन सदिखन बिचरल,
कऽ आयल अनंतक चरणस्पर्श,
चंचलतम हिय जे सबसऽ स्वच्छ,
ओ मर्त्यलोक में जियत कोना?
अस्तित्व मलिन कऽ रहत कोना?
एहि अचल पर फुदकि कोलाहल,
ओहि खग-तरुआरि सऽ सांठ मिलल,
बहिनी सब मिल-जुलि गीत गबय,
निर्भय-निर्बाध-निमग्न फिरय।
से नगर-बांध बिच कोना अटत!
मोन सूखि जायत और हृदय फटत!
अपने छी अहाँ पिता, गिरिवर!
सुनि लेलहुँ कनैत सगरो कुल-सगर।
हमहूँ छी मुदा उमा केर माँ!
सुरसरि केर बहिन छथिन जगमाँ।
नहि नर महि पर जे बान्हि सकैन्ह,
बेमोन सऽ एकठम रोकि सकैन्ह।
जदि त्रस्त लास्य पर उतरि गेली,
गूंजत सब धरती "त्राहि-त्राहि"!
नै भार हुनक ई धरा सहत,
नै स्तवन करै लऽ लोक बचत।
नै रहत कियो कटाक्ष केनिहार,
बाट रोकय बला के होयत संहार!
नर घोर धृष्टता-पाप करय,
ओकरा लेल बेटी हमर जरय?
आब एक्को टा नै धिया देब
जाबत ने घुरा सति-सिया लेब!
जदि तहियो करबै धियादान,
बलि ओकर दऽ चाही मनुख-त्राण,
तऽ सुनू शर्त हम्मर पहिले।
अधिकार सबसऽ बड्ड जननी के।
कर्त्तव्य माँ'क सबसऽ उप्पर।
नै जायत धिया धरणी असगर।
ओहि युग जे पृथ्वी भेल मलिना,
नारायण आबि कऽ मुक्त केला।
जलचर कोना जल के बचायत?
पाथर बनि एखन सुतल छथि!
श्यामा जिनका आधार केलनि,
तेहने निश्छल लग धिया देबनि।
होय करुण-हृदय जगहितकारी,
गंगाक मोन नै बुझय भारी,
होय समदर्शी जे दयावान,
मृदुभाषी, राखय सभक मान,
विज्ञान-वेद के होय ज्ञाता,
नै अपना के बुझय विधाता,
जलवेग अथाह सम्हारि सकय,
संसार-बंध सऽ विमुख रहय।
सब बिधि अपना के करय व्यक्त,
नै मौन करय जकरा अशक्त।
आसक्ति धिया पर एहेन जेकर,
हुनके लग रहि करै बयस गुजर।
अप्पन कऽ सकय मुदा निर्वाह,
नै बान्हौ चाहय स्वच्छंद प्रवाह।
सरिता केर कुल के अपन बुझय,
सब दिस जकरा तरंगिनी सुझय।
गंगा-पद झुका सकय जे माथ,
होय एहेन मनुख तऽ कहू तात!
गंगा उतरत ओकरे टा संग।
जदि नै, तऽ व्यर्थ अछि ई प्रसंग!
नै बन्हबनि सोन-महल के बीच,
नै ठेलबनि मुदा विलाप दिस।
गंगा फिरती आकाश सघन
निश्चिंत, बिना नर-रचित ग्रहण।
अंबर बनतनि हुनकर अंगना,
हिम-चंद्र-तरेगण नित गहना।
नै लाज, कोनो नै डर हेतैन्ह,
जेती जखन जतय मोन हेतैन्ह।
नर लाख रोज आयत आ जैत।
बाला नै हम्मर घुरि कऽ आयत!
हिमवंत! हमर गप अछि स्वीकार?
तऽ कहू, दऽ आबी हम हकार।
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